Wednesday, November 25, 2009

दिन के कोलाहल में
जब खो जाता है मेरा वजूद,
धमनियों की धौंकनी
हो जाती है पस्त समंदर सी,
इच्छाओं का विराट आकाश
सिमट जाता है पुराने बटुए में
तब भी
सिक्कों की तरह कहीं बजती है
तुम्हारी हंसी.
कितना अच्छा होता कि
तुम्हारी हँसी
किसी बरगद सी होती
जिसमे हर साल नयी जड़ें फूटती,
उन पर टांग दिया करती
मैं अपनी मुस्कुराती आँखें,
पर ये तो
नर्म फाहों सी उड़ती है
मेरे आस पास,
उड़ती है एक अनुभवी बाज़ सी...
मगर फिर भी
जब तुम, सिर्फ अपने लिए रोते हो
तब भी जाने क्यों
भुला देती हूँ तुम्हारी हंसी.
Painting Photo : Blue Methilen
[ ]

